लता मंगेशकर की वो 4 बातें, जिसने लता को ‘सुरों की मलिका बना दिया’

भारत रत्न लता मंगेशकर भारत की सबसे लोकप्रिय और आदरणीय गायिका हैं जिनका छह दशकों का कार्यकाल उपलब्धियों से भरा पड़ा है। हालांकि लता जी ने लगभग तीस से ज्यादा भाषाओं में फिल्मी और गैर-फिल्मी गाने गाये हैं लेकिन उनकी पहचान भारतीय सिनेमा में एक पाश्र्व गायिका के रूप में रही हैं। 28 सितंबर 1929 को मध्यप्रदेश के इंदौर में जन्मीं लता मंगेशकर को गायिकी क्षेत्र में अतुल्य योगदान देने के लिए भारत रत्न, पद्म विभूषण, पद्म भूषण और दादासाहेब फाल्के अवॉर्ड सहित कई सम्मानों से नवाजा जा चुका है। लता मंगेशकर ने 36 भाषाओं में 50 हजार से ज्यादा गीतों को अपनी आवाज दी है। आपको बताते हैं लता मंगेशकर के बारे में कुछ खास बातें।

1.ऐसा था बचपन:- 13 साल की उम्र में अपने करियर की शुरुआत करने वालीं लता मंगेशकर ने 1942 में मराठी फिल्मों में एक्टिंग की थी। ‘किती हासिल’ नाम की मराठी फिल्म में उन्होंने मराठी गीत भी गाया था हालांकि गीत को फिल्म में शामिल नहीं किया गया, लेकिन गायकी का उनका सफर वहीं से शुरू हुआ। अपने बचपन के बारे में लता मंगेशकर ने एक पुराने इंटरव्यू में कहा था, ‘हमारे यहां मान्यता है कि पहला बच्चा लड़की के मां के घर होता है। इसलिए मेरा जन्म मेरी नानी के घर इंदौर में हुआ था। फिर हम कोल्हापुर के पास सांगली चले आए। मेरे पिता जी नाटक कंपनी चलाते थे जिसे बंदकर उन्होंने एक फिल्म कंपनी बनाई। हमने वहां मकान बनाया। मैं बहुत शरारती थी, मेरे एक भाई और चार बहनें हैं। मैंने पांच-छह साल की उम्र में पिता जी से गाना सीखना शुरू किया। पिता जी ने फिर से ड्रामा कंपनी शुरू की। हम उनके साथ-साथ टहलने लगे।

2.जब लता मंगेशकर के सपने में आए थे पिता:- 1943 में 14 साल की उम्र में लता मंगेशकर कोल्हापुर से बंबई (मुंबई) के नाट्य महोत्सव में शिरकत करने के लिए आई थीं। उनकी मौसी गुलाब गोडबोले उनके साथ-साथ थीं। बंबई में लता अपने चाचा कमलानाथ मंगेशकर के घर पर ठहरीं और वहीं नाट्य संगीत का रियाज कर रही थीं। लता इस सोच में डूबी थी कि उन्हें पिता के नाम को आग बढ़ाना है और संगीत समारोह में बेहतर प्रदर्शन करना है। पर उनके चाचा नाराज हो रहे थे कि यह लड़की उनके भाई का नाम खराब कर रही है, कहां पंडित दीनानाथ मंगेशकर जैसा सुधी गायक और कहां यह लड़की? यह ठीक से गा नहीं पाएगी, जिससे उनके खानदान के नाम पर बुरा असर पड़ेगा। यही चिंता उनकी विजया बुआ और फूफा कृष्णराव कोल्हापुरे (अभिनेत्री पद्मिनी कोल्हापुरे के दादा) को भी हो रही थी कि लता ठीक से गा नहीं पाएगी। यह सब सुनकर लता आहत हो गईं और रोने लगीं। उन्होंने अपनी बात मौसी से कही, तो मौसी ने यह कहकर उनका ढांढस बंधाया कि तुम्हें किसी भी तरह से उदास होने की जरूरत नहीं है, बस अपने पिता का स्मरण करो, वे ही तुम्हारे संगीत को सही राह दिखाएंगे। लता मंगेशकर के पिता दीनानाथ मंगेशकर की हृदय रोग के चलते 1942 में निधन हो गया था। बंबई नाट्य महोत्सव के आयोजन से पहले वे लता के सपने में नजर आए। वहां से हुई शुरुआत के बाद लता मंगेशकर ने कभी मुड़कर नहीं देखा। सात दशक से लंबे अपने करियर में उन्होंने 36 भाषाओं में करीब 50 हजार लोकप्रिय गीतों को अपनी आवाज दी है।

3.200 रु’पये थी पहली क’माई:- लता ने आगे बताया था, ‘मुझेअभिनय का शौक बिल्कुल नहीं था। पिता जी की ड्रामा कंपनी में छोटे बच्चों के रोल किया करती थी। पिता जी जब तक जीवित थे तब तक कुछ शौक था। पिता जी का देहांत 1942 में हुआ। उसके बाद परिवार की पूरी जिम्मेदारी मेरे ऊपर आ गई। तब मैंने ‘नवयुग फिल्म्स प्राइवेट लिमिटेड’ के लिए एक फिल्म की। इसमें मैं हीरोइन की बहन बनी थी। वो मेरी पहली फिल्म थी जिसका नाम था ‘पहली मंगला गौड़’। वो एक मराठी फिल्म थी। ये फिल्म करने के बाद मैं कोल्हापुर आई। वहां मास्टर विनायक थे। मराठी फिल्मों में उनका बहुत नाम था। उनकी कंपनी में मैंने नौकरी कर ली, मेरा पगार दो सौ रुपए थी। उस समय के हिसाब से बहुत ही अच्छी पगार थी। लेकिन भाई हृदयनाथ बहुत बीमार रहता था। पिता जी के समय में हम लोग बहुत शान से रहा करते थे। वैसा समय तो रहा नहीं। मैं सुबह से शाम तक काम करती थी तो पढ़ना-लिखना हुआ नहीं।’

4.जब संगीतकारों ने साथ काम करने से किया था मना:- लता मंगेशकर को शुरू के वर्षों में काफी संघर्ष करना पड़ा कई फिल्म प्रोड्यूसरों और संगीत निर्देशकों ने यह कहकर उन्हें गाने का मौका देने से इनकार कर दिया कि उनकी आवाज बहुत महीन है। लता का सितारा पहली बार 1949 में चमका और ऐसा चमका कि उसकी कोई मिसाल नहीं मिलती, इसी वर्ष चार फिल्में रिलीज हुईं, ‘बरसात’, ‘दुलारी’, ‘महल’ और ‘अंदाज’। ‘महल’ में उनका गाया गाना ‘आएगा आने वाला आएगा’ के फौरन बाद हिंदी फिल्म इंडस्ट्री ने मान लिया कि यह नई आवाज बहुत दूर तक जाएगी। यह वह जमाना था जब हिंदी फिल्मी संगीत पर शमशाद बेगम, नूरजहां और जोहराबाई अंबालेवाली जैसी वजनदार आवाज वाली गायिकाओं का राज चलता था। ओपी नैयर को छोड़कर लता मंगेशकर ने हर बड़े संगीतकार के साथ काम किया, मदनमोहन की गजलें और सी रामचंद्र के भजन लोगों के मन-मस्तिष्क पर अमिट छाप छोड़ चुके हैं। पचास के दशक में नूरजहां के पाकिस्तान चले जाने के बाद लता मंगेशकर ने हिंदी फिल्म पार्श्वगायन में एकछत्र साम्राज्य स्थापित कर लिया, कोई ऐसी गायिका कभी नहीं आई जिसने उनके के लिए कोई ठोस चुनौती पेश की हो। बेमिसाल और सर्वदा शीर्ष पर रहने के बावजूद लता ने बेहतरीन गायन के लिए रियाज के नियम का हमेशा पालन किया, उनके साथ काम करने वाले हर संगीतकार ने यही कहा कि वे गाने में चार चांद लगाने के लिए हमेशा कड़ी मेहनत करती रहीं।

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